संस्कार — जब जीवन आकार लेता है
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें उस आधार की बात बताने आया हूँ जिस पर पूरा मानव जीवन खड़ा होता है — संस्कार।
सनातन धर्म कहता है — मनुष्य जन्म से पूर्ण नहीं होता, वह संस्कारों से गढ़ा जाता है।
संस्कार केवल रीति-रिवाज़ नहीं, वे जीवन की दिशा तय करने वाली सूक्ष्म छाप हैं, जो मन, विचार और स्वभाव पर पड़ती हैं।
जिसे तुम बार-बार देखते हो, जिसे बार-बार सुनते हो, जिसे बार-बार करते हो — वही तुम्हारा संस्कार बन जाता है।
इसीलिए सनातन ने जीवन को अनियंत्रित नहीं छोड़ा। उसने जन्म से मृत्यु तक संस्कारों की एक श्रृंखला दी — ताकि मनुष्य अहंकार नहीं, मर्यादा में पले।
संस्कार का अर्थ है — भीतर की मिट्टी को उपजाऊ बनाना। अगर मिट्टी शुद्ध है, तो उसमें सत्य उगेगा। अगर मिट्टी दूषित है, तो उसमें विष उगेगा।
आज लोग कहते हैं — “बच्चा ऐसा क्यों हो गया?” पर वे यह नहीं देखते कि उसने क्या देखा, क्या सुना, क्या सीखा।
सनातन कहता है — शिक्षा बाद में आती है, संस्कार पहले आते हैं। क्योंकि शिक्षा रोज़गार देती है, संस्कार चरित्र देते हैं।
जिस समाज में संस्कार टूट जाते हैं, वहाँ कानून बढ़ते हैं। और जहाँ संस्कार जीवित रहते हैं, वहाँ विवेक शासन करता है।
संस्कार किसी पर थोपे नहीं जाते, वे जीए जाते हैं। बच्चे उपदेश नहीं, अनुकरण करते हैं।
इसलिए अगर तुम चाहते हो कि अगली पीढ़ी सुधरे, तो भाषण मत दो — स्वयं सुधरो।
संस्कार कोई बोझ नहीं, वे सुरक्षा कवच हैं, जो जीवन को बिखरने से बचाते हैं।
सनातन इसलिए अमर है, क्योंकि उसने मनुष्य को बदला नहीं, संवारा है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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