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ज्ञान के बिना भक्ति को अपूर्ण क्यों कहा गया

ज्ञान के बिना भक्ति को अपूर्ण क्यों कहा गया

ज्ञान के बिना भक्ति को अपूर्ण क्यों कहा गया

Bhakti and Gyan Sanatan Philosophy

सनातन दर्शन में भक्ति को अत्यंत ऊँचा स्थान दिया गया है, पर उसी के साथ एक सूक्ष्म और गहन सत्य भी कहा गया है—ज्ञान के बिना भक्ति अपूर्ण रह जाती है। इसका अर्थ नहीं कि भक्ति का मूल्य कम है, बल्कि यह कि भक्ति की पूर्णता ज्ञान से होती है। जैसे नेत्रों के बिना प्रेम अंधा हो सकता है, वैसे ही ज्ञान के बिना भक्ति भावुक तो हो सकती है, पर दिशाहीन भी बन सकती है।

सनातन दृष्टि में भक्ति का अर्थ केवल भावनात्मक लगाव नहीं है। भक्ति का वास्तविक अर्थ है—सत्य के प्रति समर्पण। और सत्य को जाने बिना समर्पण संभव नहीं। यदि यह न समझा जाए कि मैं किसका, क्यों और कैसे भजन कर रहा हूँ, तो भक्ति धीरे-धीरे आदत, कर्मकांड या केवल भावुकता बन जाती है। शास्त्र कहते हैं कि ऐसी भक्ति मन को शांति तो दे सकती है, पर मुक्ति नहीं दे सकती—क्योंकि उसमें बोध का अभाव रहता है।

उपनिषदों का यह स्पष्ट संकेत है कि अज्ञान में की गई भक्ति भी अंततः अज्ञान को ही पुष्ट कर सकती है। यदि व्यक्ति ईश्वर को बाहर कहीं बैठा हुआ कोई शक्ति मान ले, जो केवल प्रसन्न या अप्रसन्न होती है, तो उसकी भक्ति भय और लोभ के बीच झूलती रहती है। वह ईश्वर को जानता नहीं, केवल उससे कुछ चाहता है। ज्ञान भक्ति को इस स्तर से ऊपर उठाता है—वह बताता है कि ईश्वर कोई दूर की सत्ता नहीं, बल्कि चेतना का ही विस्तार है। जब यह बोध आता है, तब भक्ति याचना नहीं रहती, वह सान्निध्य बन जाती है।

भगवद्गीता में यह संतुलन अत्यंत स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। भगवान कृष्ण केवल भक्ति की बात नहीं करते, वे ज्ञान के बिना भक्ति को अधूरा बताते हैं और भक्ति के बिना ज्ञान को शुष्क। वे कहते हैं कि ज्ञानी भक्त वही है, जिसकी भक्ति अंधी नहीं होती। अर्जुन पहले भाव में डूबा हुआ था—करुणा, मोह और भक्ति के भाव से—पर वह भ्रमित था। कृष्ण ने पहले उसे ज्ञान दिया—आत्मा का, कर्म का, धर्म का—और उसी ज्ञान के आधार पर उसकी भक्ति स्थिर और स्पष्ट हुई। यही कारण है कि गीता में भक्ति, ज्ञान और कर्म—तीनों को एक-दूसरे से जोड़ा गया है, अलग नहीं किया गया।

ज्ञान के बिना भक्ति के अपूर्ण होने का एक बड़ा कारण यह भी है कि अज्ञान में की गई भक्ति आसक्ति में बदल सकती है। व्यक्ति ईश्वर के नाम पर अपने अहंकार, अपने समूह या अपनी पहचान को सर्वोच्च मानने लगता है। तब भक्ति करुणा नहीं बढ़ाती, बल्कि विभाजन पैदा करती है। शास्त्रों ने ऐसी भक्ति को सात्त्विक नहीं माना। ज्ञान यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर एक है, रूप अनेक हैं—और यही समझ भक्ति को व्यापक बनाती है, संकीर्ण नहीं।

सनातन शास्त्र यह भी कहते हैं कि ज्ञान के बिना भक्ति व्यक्ति को बाहरी चिह्नों में उलझा देती है—मूर्ति, विधि, नियम, पहचान। पर ज्ञान आने पर वही भक्ति भीतर की यात्रा बन जाती है। तब व्यक्ति समझता है कि पूजा केवल मंदिर में नहीं, हर कर्म में है; हर श्वास में है। ज्ञान भक्ति को सीमाओं से मुक्त करता है। इसलिए कहा गया कि भक्ति का शिखर आत्म-बोध है—और आत्म-बोध बिना ज्ञान के संभव नहीं।

एक और गहरा कारण है—भय का स्थान। अज्ञानजन्य भक्ति में भय बना रहता है—डर कि कहीं नियम टूट न जाए, कहीं ईश्वर रुष्ट न हो जाए। ज्ञान इस भय को दूर करता है। जब यह बोध आता है कि ईश्वर दंड देने वाला नहीं, बल्कि चेतना का आधार है, तब भक्ति भय से मुक्त हो जाती है। भयमुक्त भक्ति ही प्रेम में बदलती है। और प्रेम ही भक्ति की पूर्ण अवस्था है।

संत परंपरा भी इसी सत्य की पुष्टि करती है। कबीर, तुलसी, मीरा—सबने भक्ति की, पर वह अज्ञान से उपजी नहीं थी। उनके शब्दों में प्रश्न थे, विवेक था, और सत्य की खोज थी। वे आँख मूँदकर नहीं झुके; उन्होंने समझकर समर्पण किया। इसलिए उनकी भक्ति समाज को जोड़ती है, तोड़ती नहीं। यही ज्ञानयुक्त भक्ति की पहचान है।

सनातन दृष्टि में ज्ञान का अर्थ पुस्तकीय जानकारी नहीं है। ज्ञान का अर्थ है—यथार्थ का बोध। जब भक्त यह जान लेता है कि ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है; कि सेवा ही पूजा है; कि करुणा ही भक्ति का मापदंड है—तब उसकी भक्ति परिपक्व हो जाती है। तब उसे दिखावे की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि उसकी भक्ति जीवन में उतर चुकी होती है।

अंततः शास्त्र यह नहीं कहते कि पहले ज्ञान लाओ, फिर भक्ति करो। वे कहते हैं—भक्ति करते-करते ज्ञान जगाओ, और ज्ञान से भक्ति को शुद्ध करो। दोनों का संबंध क्रम का नहीं, परिपक्वता का है। भक्ति हृदय खोलती है, ज्ञान दृष्टि देता है। बिना दृष्टि हृदय भटक सकता है, और बिना हृदय दृष्टि कठोर हो सकती है।

सनातन संदेश अत्यंत स्पष्ट और करुणामय है—
भक्ति बिना ज्ञान भावुकता है,
ज्ञान बिना भक्ति शुष्कता।
भक्ति को पूर्णता ज्ञान देता है,
और ज्ञान को मधुरता भक्ति देती है।

जहाँ दोनों एक हो जाते हैं,
वहीं साधना पूरी होती है—
वहीं मनुष्य डर से नहीं,
प्रेम से ईश्वर की ओर बढ़ता है।

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